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बुधवार, 15 दिसंबर 2010

सीबीआई खोलेगी बाघ की मौत के राज


बाबूलाल शर्मा 
जयपुर. सरिस्का अभयारण्य में जहर देकर मारे गए बाघ एसटी-1 की मौत के राज अब सीबीआई खोलेगी।

सीबीआई ने बाघ की हत्या के आरोपी परसादीलाल का पॉलीग्राफ (झूठ पकड़ने वाला) टेस्ट कराने की वन विभाग की अपील मंजूर कर ली है। परसादीलाल का बुधवार को दिल्ली में पॉलीग्राफ टेस्ट होगा। सीबीआई 2004-05 में भी सरिस्का में 27 बाघों की मौत की जांच कर चुकी है। उस समय मुख्य आरोपी संसारचंद्र को गिरफ्तार किया गया था। एसटी-1 सरिस्का में 15 नवंबर को मृत मिला था।

फोरेंसिक जांच में उसे जहर दिए जाने का खुलासा हुआ। वन विभाग ने 4 दिसंबर को कालाखेत निवासी परसादी लाल को गिरफ्तार किया। पूछताछ में परसादी के बार-बार बयान बदलने के बाद वन विभाग ने 13 दिसंबर को राजगढ़ न्यायालय से उसके ब्रेन मैपिंग, नारको टेस्ट और पोलीग्राफ टेस्ट अनुमति ली। 14 दिसंबर को विभाग ने सीबीआई के समक्ष पोलीग्राफ टेस्ट की एप्लीकेशन लगाई, जिसे मंजूरी देते हुए टेस्ट के लिए 15 और 16 दिसंबर की तारीख तय की गई।

एसटी-1 की हत्या के कारणों का खुलासा करने के लिए वन विभाग और सीबीआई मिलकर काम कर रहे हैं। परसादी का पोलीग्राफ टेस्ट भी इसी कड़ी का हिस्सा है। हर हाल में सच सामने लाएंगे। - आर एन मेहरोत्रा, प्रधान मुख्य वन संरक्षक

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

आदमी ही आदमी से प्यार करता है

आदमी ही आदमी का खून रता है।
आदमी ही आदमी से प्यार रता है,
आदमी ही आदमी पर वार रता है।

गाना जो गा रहा है, वो भी आदमी है,
सडक़ पर रोता जो जा रहा है, वो भी आदमी है।
गोली जो चला रहा है वो भी आदमी है,
गोली जो खा रहा है, वो भी आदमी है।

जेलर भी है आदमी, कैदी भी है आदमी
कोड़े जो खा रहा है वो भी आदमी है,
                                                                                                                                                 रिक्शे पर जो रहा है, वो भी आदमी है।
                                                     मंदिर, मस्जिद बनवाए आदमी ने,
Sh Suresh Chandra Sharma
phone no. 9351718660
01412296683

धार्मि उन्माद आया तो उन्हें गिराया भी आदमी ने।

बुधवार, 8 सितंबर 2010

सभ्यता से असभ्यता की ओर

बाबूलाल शर्मा. जयपुर. शहरों का व्यवस्थित ढांचा कितना जरूरी है..सिंधु घाटी सभ्यता इसकी मिसाल है। तकरीबन 5000 साल पहले मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के योजनाकारों ने जान लिया था कि सही ड्रेनेज और सीवरेज सिस्टम के बिना अच्छे शहर बनाना मुमकिन नहीं। लेकिन..आज बेतरतीब फैल रहे शहरों में सरकारें बुनियादी सुविधाएं जुटाने में खरी नहीं उतर रहीं।

जयपुर के सिर्फ 25 फीसदी घर ही ड्रेनेज सिस्टम से जुड़े हैं। 300 साल पहले वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य की सोच को अगर सरकारी एजेंसियां क्रियान्वित कर शहर में इन्टीग्रेटेड ड्रेनेज सिस्टम विकसित कर लेतीं तो सड़कें बरसाती पानी में न बह जातीं।

डेढ़ करोड़ का खाका, 1100 करोड़ का प्रोजेक्ट..कागजी पुलिंदा

न या शहर बसने के बाद जब बरसात के पानी की निकासी रुकने लगी तो नगर निगम और जेडीए को आजादी के पांच दशक बाद शहर में ड्रेनेज सिस्टम विकसित करने की सुध आई। हड़बड़ी में जेडीए ने इसके लिए कन्सल्टेंसी कंपनी से डीपीआर बनवाई। ड्रेनेज सिस्टम का खाका बनाने में डेढ़ करोड़ रुपए खर्च कर दिए।

कन्सल्टेंसी कंपनी दो साल पहले 1100 करोड़ लागत का ड्रेनेज प्रोजेक्ट जेडीए को दे चुकी, लेकिन यह कागजी पुलिंदा कभी जेडीए तो कभी नगर निगम के बीच फुटबॉल बना घूम रहा है। सरकारी हुक्मरानों का कहना है कि निगम के पास सफाई जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए ही धन नहीं है।

मुंबई : कई बार भुगता है खमियाजा

खराब ड्रेनेज सिस्टम के चलते ही वर्ष 2005 में मानसून देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर बाढ़ का कहर बनकर बरसा। इससे पहले वर्ष 1985 में भी मुंबई पानी-पानी हुई थी। 2005 की बाढ़ के बाद महानगर का ड्रेनेज सिस्टम सुधारने के लिए 1200 करोड़ का बजट रखा गया, जो संभवत: 2011 में पूरा होगा। सिस्टम कहीं-कहीं सौ साल पुराना है। इसमें 440 किमी ड्रेन ढंके व कुल 2000 किमी खुले हैं। खुले ड्रेन में लोग कचरा डाल देते हैं, जो बरसात के मौसम में बंद हो जाते हैं और बाढ़ की स्थिति पैदा करते हैं।

टोक्यो का ड्रेनेज सिस्टम दुनिया में सबसे बड़ा

जापान की राजधानी टोक्यो में दुनिया का सबसे बड़ा और अत्याधुनिक ड्रेनेज सिस्टम जी-कैन्स बनाया गया है। साल 1992 में जी-कैन्स प्रोजेक्ट शुरू हुआ, इसे 2004 में पूरा किया गया। इसमें एक विशाल टबरे पंप है, जिसकी क्षमता 14000 हॉर्सपावर है। यह टबरे पंप एक सैकंड में 200 टन पानी इडोगावा नदी में डाल सकता है।

इंजीनियर कहते हैं कि पूरा समुद्र बरस जाए तो भी यह सिस्टम फेल नहीं होगा। यह जमीन में 50 मीटर गहरा है। शहरभर में फैली इससे जुड़ने वाली टनल्स सैकड़ों किलोमीटर लंबी हैं। इसे बनाने पर 90 अरब रुपए का खर्च आया है।

ड्रेनेज सिस्टम को अमल में लाने के लिए हमारे पास पैसा नहीं है। हम 1100 करोड़ का यह प्रोजेक्ट जेएनएनयूआरएम में स्वीकृत कराएं तो भी 300 करोड़ रुपए हिस्सा राशि देनी होगी, जो हमारे पास नहीं। इस स्थिति में हम कुछ नहीं कर सकते।
ज्योति खंडेलवाल,
महापौर, जयपुर

भवनों के नक्शे पास करने के बदले स्थानीय निकाय फीस लेते हैं। विकास शुल्क भी हम अलग से जमा करवाते हैं। आमजन से हाउस टैक्स-यूडी टैक्स भी सरकार लेती है। ऐसे में शहर में ड्रेनेज सिस्टम विकसित करने की जिम्मेदारी भी सरकार की ही है।
गोपाल गुप्ता, अध्यक्ष, राजस्थान बिल्डर्स एंड प्रमोटर्स एसोसिएशन

रविवार, 22 अगस्त 2010

खेलों के पावर गेम में अफसर

बाबूलाल शर्मा
जयपुर. राजस्थान में जहां आईएएस और आरएएस अफसरों की कमी बनी हुई है, वहीं प्रशासनिक कामकाज को बेहतर करवाने की चिंता छोड़ सरकार अफसरों से खेल संघों की राजनीति करवा रही है। हाल ये हैं कि विकास योजनाएं बनाने का काम छोड़ अफसर खेलों के पावर गेम में उलझे हुए हैं। कई अफसर ऐसे भी हैं जो खेल संघों में आला पदों पर तो हैं, लेकिन प्रशासनिक व्यस्तता के कारण खेलों की सुध ही नहीं ले पा रहे हैं।

दिलचस्प तथ्य यह भी है कि खेल संघों में आईएएस, आरएएस व आईपीएस अधिकारियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए राज्य सरकार ने जून २००६ में एक सकरुलर जारी किया था, जिसमें यह स्पष्ट निर्देश था कि अधिकारी किसी भी संघ या संस्था से जुड़ने से पहले सरकार की अनुमति ले। क्योंकि इन संघों व संस्थाओं में फंड कलेक्शन होता है। सरकार की हिदायत के बावजूद किसी भी अफसर ने अनुमति लेना मुनासिब नहीं समझा। खेल संघों में अफसरों की सक्रियता को लेकर पिछले दिनों हाईकोर्ट भी कड़ी टिप्पणी कर चुका है।

कौन, किस पद पर

आईएएस संजय दीक्षित : आरसीए व राज्य टेनिस संघ के सचिव
आईएएस अजीत कुमार सिंह : टेबल टेनिस संघ के अध्यक्ष (सिंह का कहना है- सरकार को सूचित किया हुआ है। )
आरएएस बीएल जाटावत : टेबल टेनिस जयपुर संघ के अध्यक्ष
आरएएस अजय सिंह चित्तौड़ा : कैरम संघ के अध्यक्ष
आईपीएस नवदीप सिंह : गोल्फ संघ के सचिव
आईएएस निरंजन आर्य : राज्य जिम्नास्टिक संघ के अध्यक्ष
आरएएस एलसी असवाल : बॉल बैडमिंटन संघ के अध्यक्ष
आयकर आयुक्त दिलीप शिवपुरी : जयपुर जिला बैडमिंटन संघ के अध्यक्ष

पहले खुद अब पत्नी

रॉलबॉल संघ के गठन के बाद आईएएस अधिकारी मनोहरकांत इसके अध्यक्ष बने थे। तब मनोहरकांत राज्य खेल परिषद के अध्यक्ष थे। बाद में उन्होंने पद छोड़ दिया, लेकिन पत्नी सरिता कांत को इस पद पर काबिज कर दिया।
ये कहते हैं अफसर

अब ले लूंगा अनुमति

मैं करीब दो साल से जिम्नास्टिक संघ का अध्यक्ष हूं। डीओपी से अनुमति लेने की अनिवार्यता का पता नहीं था। अब अनुमति लूंगा। - निरंजन आर्य, वाणिज्य कर आयुक्त

और अधिकारी भी तो हैं

मैं बैडमिंटन संघ, जयपुर का जिलाध्यक्ष पिछले दस साल से हूं। अनुमति के बारे में आप क्यों पूछ रहे हैं, और भी तो अधिकारी खेल संघों में हैं। - दिलीप शिवपुरी, आयकर आयुक्त, जोधपुर

शायद मेरा बेटा सचिव है

मैं अभी सचिव नहीं हूं। मेरी पत्नी गोल्फ संघ की अध्यक्ष हैं। अब शायद मेरे बेटे को उन्होंने सचिव बना रखा है। - नवदीपसिंह, एडीजी (लॉ एंड ऑर्डर)

(भले ही नवदीपसिंह खुद को सचिव नहीं मानते हों लेकिन खेल परिषद के रिकॉर्ड में वे ही सचिव हैं।)
अनुमति की कहां जरूरत है

मैं पांच साल से बाल बैडमिंटन संघ का अध्यक्ष हूं। सरकार से अनुमति लेने की कहां जरूरत है। हां मैं दौसा में तैनात हूं लेकिन जब मीटिंग होती है तो चला जाता हूं। - एलसी असवाल, कलेक्टर, दौसा

यह फुल टाइम वर्क थोड़े है

पांच छह साल से टेबल टेनिस संघ का जिलाध्यक्ष हूं। सरकार से अनुमति तो मैंने नहीं ली। हां सीएमओ में हूं लेकिन रुटिन वर्क प्रभावित नहीं होता। - बीएल जाटावत, उप सचिव, मुख्यमंत्री कार्यालय

मैं पहले था, अब मेडम है

रॉलबॉल संघ से पहले मेरा जुड़ाव रहा था। मैं अध्यक्ष था। बाद में इस संघ की अध्यक्ष मेरी पत्नी बन गई। - मनोहरकांत, प्रमुख सचिव, श्रम विभाग

.और हां-ना करते रहे कार्मिक सचिव


क्या अफसरों ने खेल संघों में पदाधिकारी बनने से पहले सरकार से अनुमति ली है? अनुमति नहीं लेने वालों पर क्या कार्रवाई होगी? कार्मिक विभाग के प्रमुख सचिव खेमराज तीन दिन में भी इस सवाल का जवाब नहीं दे पाए। भास्कर संवाददाता उनके कार्यालय भी गए, बावजूद कोई जवाब नहीं मिला। उनके मोबाइल नंबर ९४१४०६४८४८ पर फिर से सवाल दोहराया गया तो वे कभी हां और कभी ना में जवाब देते रहे।


कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए

अफसरों का काम योजनाएं बनाकर जन सेवा करना है, लेकिन वे पावर गेम में फंस गए हैं। सरकार को चाहिए कि खेल संघों से जुड़ने वाले अफसरों से पूछे कि क्या उन्होंने अनुमति ली है। यदि नहीं तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। - मिट्ठालाल मेहता, पूर्व मुख्य सचिव

शनिवार, 31 जुलाई 2010

खामियों का कॉरिडोर, उद्घाटन आज

बाबूलाल शर्मा
जयपुर. जयपुर में तेज और सुरक्षित यातायात के लिए अपनाया गया बस रेपिड ट्रांजिट सिस्टम (बीआरटीएस) खामियों का कॉरिडोर बन गया है। अब तक 65 करोड़ रु. खर्च किए जाने के बावजूद यह अपने उद्देश्य को पूरा करता नजर नहीं आ रहा। जगह-जगह कट और जंक्शन के कारण कॉरिडोर में लो फ्लोर बसें गति नहीं पकड़ पा रही हैं।

ऐसी कई खामियां हैं, जो सीकर रोड पर वीकेआई नंबर 14 से अंबाबाड़ी तक 7.1 किमी के इस ऑपरेशनल कॉरिडोर के डिजाइन पर सवाल खड़े कर रही हैं। वैसे तो कॉरिडोर सितंबर 09 में तैयार हो गया और इसमें बसें भी दौड़ने लगीं, लेकिन शनिवार को केंद्रीय शहरी विकास मंत्री एस. जयपाल रेड्डी इसका फीता काटेंगे। भास्कर ने शुक्रवार को जब बीआरटीएस एक्सपर्ट कन्सलटिंग इंजीनियर्स ग्रुप लि. व मेरिडियन स्पेस फॉर प्लानिंग एंड क्रियेटिविटी के विशेषज्ञों के साथ मौके की पड़ताल की तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।

शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी आज जयपुर में

शहरी विकास मंत्री एस. जयपाल रेड्डी शनिवार को जयपुर में जवाहरलाल नेहरू नेशनल अरबन रिन्युअल मिशन (जेएनएनयूआरएम) के तहत शुरू की गई बीआरटीएस बस का सुबह 11 बजे उद्घाटन करेंगे। वे इसके बाद सेंट्रल पार्क में जयपुर बस के इनोवेशन को लेकर लगने वाली प्रदर्शनी का उद्घाटन करेंगे।

वे शुक्रवार को ही जयपुर पहुंच गए। नगरीय विकास एवं स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल ने बताया कि रेड्डी से जेएनएनयूआरएम के तहत चल रही योजनाओं यूआईडी, यूआईडीएसएसएमटी, आईएचएसडीपी और बीएसयूपी के तहत फंड अलोकेशन को लेकर बात होगी। जयपुर मेट्रो के प्रोजेक्ट को लेकर भी रेड्डी से बात करेंगे कि केन्द्र सरकार इसके लिए अधिक से अधिक सहायता राशि जारी करे।

ऐसा तो नहीं होना चाहिए रैपिड सिस्टम

कॉरिडोर में 11 रोड कट। 13 रेड लाइट। इस कारण रेंगती हैं लो फ्लोर बसें। बस स्टॉप पर आने के लिए न फुट ओवरब्रिज न अंडरपास, हादसे का खतरा। पार्किग लॉट नहीं। स्लिप लेन में खड़े होते हैं वाहन, यातायात प्रभावित। 35-40 मीटर चौड़े कॉरिडोर में न वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम और न ही ड्रेनेज।

किराया ज्यादा, समय बराबर

भास्कर रिपोर्टर ने चौमूं पुलिया से रोड नंबर 14 तक मिनी बस और लो फ्लोर बस में अलग-अलग सफर किया। दोनों बसों में सफर पर 17 मिनट का समय लगा, बल्कि लो फ्लोर में एक रुपया किराया ज्यादा देना पड़ा। मिनी बस ने 6 और लो फ्लोर ने सात रु. किराया वसूला।

फ्लाईओवर जरूरी

जितने भी बस स्टॉप हैं उन पर फुट ओवर ब्रिज बनने जरूरी हैं। बस तेज गति से चले इसके लिए जंक्शन पर फ्लाईओवर भी जरूरी हैं। - विश्वास जैन, प्रबंध निदेशक, सीईजी

पानी रिचार्ज सिस्टम नहीं

कॉरिडोर में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम जरूरी है। अगर यह होता तो 25 मिमी बारिश में ही 55 लाख लीटर पानी रिचार्ज होता। - मोहित सक्सेना, निदेशक मेरिडियन कंसल्टेंसी

बसें लो फ्लोर, स्टॉपेज हाई फ्लोर

बस रूट चार्ट व डिस्पले बोर्ड की व्यवस्था नहीं है। पार्किग स्थल भी नहीं है। बस लो फ्लोर है, लेकिन बस स्टॉप हाई फ्लोर। चढ़ने-उतरने में दिक्कत आ रही है। - वीनू जैन, सिविल इंजीनियर, यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ हैम्प्टन (यूके)

सोमवार, 26 जुलाई 2010

8 दिन से डूबा है गांव

जयपुर. राजधानी से महज 35 किमी दूर बेणिया का बास गांव आठ दिन से बरसाती पानी में डूबा है। हैरानी यह है कि आपदा प्रबंधन सचिव तन्मय कुमार को सोमवार को इसका पता चला। जिला प्रशासन की बेबसी देखिए कि पानी निकालने में नाकाम रहने के बाद अब वह गांव को ही दूसरी जगह बसाने की तैयारी में जुट गया है। भास्कर संवाददाता बाबूलाल शर्मा, श्यामराज शर्मा और फोटो जर्नलिस्ट महेंद्र शर्मा ने इस गांव में जाकर लिया हालात का जायजा।


> 100 परिवार बेघर।

> तीन दिन में प्रशासन निकाल पाया महज 3.5 फीट पानी। अभी भी जमा है 7 फीट तक पानी।

> आसपास के खेतों में निकाला जा रहा है पानी, बारिश हुई तो यह फिर बन सकता है खतरा।

> मकानों में आई दरारें। कभी भी गिर सकते हैं एक दर्जन मकान।

> मवेशी मरे, दवाइयों का छिड़काव नहीं, महामारी फैलने का खतरा।

> एक स्कूल डूबा, दूसरे में शरण लिए हुए हैं ग्रामीण।



मुझे आज ही पता चला

कलेक्टर ने मुझे आज ही बताया है। कलेक्टर को कहा है कि सरकार से जो भी मदद चाहिए, बता दें।

— तन्मय कुमार, सचिव, आपदा प्रबंधन विभाग

शिफ्टिंग ही विकल्प

गांव को शिफ्ट करने के सिवा कोई चारा नहीं है। 80 परिवारों को हिंगोनिया गांव में शिफ्ट करेंगे। इनको जमीन दिखा दी है।

— कुलदीप रांका, कलेक्टर

सोमवार, 12 जुलाई 2010

विकास ठप, खामोश सरकार

बाबूलाल शर्मा/भरत


जयपुर. महापौर और नगर निगम बोर्ड के असफल हो जाने के बाद अब समितियों के गठन का मामला राज्य सरकार के पाले में है।

निगम की मंगलवार को होने वाली साधारण सभा की बैठक में समिति गठन का प्रस्ताव एजेंडे में इसीलिए शामिल नहीं किया गया है क्योंकि महापौर द्वारा मांगी गई विधिक राय में सामने आया है कि बोर्ड गठन के 90 दिन बाद राज्य सरकार ही समितियों का गठन करने में सक्षम है। जबकि सरकार नहीं मूड में सरकार इस सोच पर काम कर रही है कि समितियों का मामला उलझाए रखा जाए ताकि भाजपा के पार्षदों के हाथों में फैसले का अधिकार नहीं जाए। यही कारण है कि समितियों का गठन करवाने के बजाय महापौर के अधिकार बढ़ाकर उसे और पावरफुल कर दिया है, ताकि एक करोड़ तक के वित्तीय फैसले वह कर सके। पहले महापौर के पास 25 लाख तक के ही वित्तीय स्वीकृति के अधिकार थे।

शुरू से ही दोहरी चाल

साधारण सभा में समिति गठन नहीं होने के बाद भाजपा पार्षद दल ने नगरीय विकास मंत्री शांति धारीवाल से गुहार की थी, लेकिन धारीवाल ने कहा था कि महापौर से इस संबंध में बात की जाएगी। अब आठ माह गुजर जाने के बाद भी इस मामले में सरकार के स्तर पर कोई पहल नहीं की जा रही। धारीवाल का कहना है कि समितियों का गठन करना महापौर और बोर्ड का काम है।

समितियों के गठन के बिना सड़क, सफाई या विकास से जुड़ा कोई भी कार्य संभव नहीं है। शहर की सरकार समितियां बनाकर ही विकास योजना तैयार करती है। फिर समितियों के अध्यक्ष उसको अमलीजामा पहनाते हैं और यही योजनाएं जयपुर शहर को रहनशील बनाती हैं। हैरानी है कि 7 महीने गुजर जाने के बाद भी अभी तक समितियों का अस्तित्व तक नहीं है। ऐसे में सवाल ये है कि वाकई जयपुर रहनशील शहर की श्रेणी में है।

13 का खेल

निगम की साधारण सभा मंगलवार को आयोजित होगी। इस बैठक के एजेंडे में भी समितियों के गठन का प्रस्ताव शामिल नहीं किया गया है, इसे लेकर भाजपा व कांग्रेस पार्षदों में भी ठनी हुई है। यही वजह है कि बैठक हंगामेदार होने के आसार हैं। यह भी एक संयोग ही है कि पहली बैठक 13 जनवरी, दूसरी बैठक 13 अप्रैल और तीसरी बैठक 13 मई को हुई। अब बैठक 13 जुलाई को होने जा रही है। इसे लेकर भाजपा पार्षद दल भी पंडितों से राय-मशविरा कर रहे हैं। भाजपा पार्षदों का कहना है कि 13 तारीख को बैठक होने के कारण ही सभी बैठकें हंगामेदार हुई यहीं नहीं साधारण सभा में चप्पल-जूते तक दिखाए गए। और एक भी प्रस्ताव पास नहीं हो पाया।

इन बयानों पर भी गौर फरमाएं

मैं कंट्रोवर्सी में नहीं पड़ूंगा : धारीवाल

समिति गठन के मुद्दे पर धारीवाल से जब बात की गई तो वे बार-बार यही कहते रहे, महापौर से पूछिए..यह बोर्ड का काम है। बोर्ड को ही करना है। जब उन्हें बताया गया कि 90 दिन होते ही यह मामला सरकार के पाले में आ गया था, फिर भी समितियों का गठन क्यों नहीं हुआ तो भी उनका कहना था, मैं कुछ नहीं बोलूंगा। मैं कंट्रोवर्सी में नहीं पड़ूंगा।

हम फेल हो गए

समिति गठन के मामले में हम फेल हो गए हैं। अब सरकार ही समितियों का गठन कर सकती है। बोर्ड निर्वाचन के 90 दिन बाद तक ही समिति गठन का अधिकार निगम के पास था। साधारण सभा में इस बीच दो बार प्रस्ताव लाया गया। एक बार तो चर्चा ही नहीं हुई, दूसरी बार खारिज हो गया। मंगलवार को हो रही साधारण सभा की बैठक में एंजेंडे में प्रस्ताव शामिल करने के लिए महापौर ने विधिक राय मांगी थी, हमने यही राय दी है कि कानून के प्रावधानों के अनुसार 90 दिन गुजर जाने के कारण इसे एजेंडे में अब शामिल नहीं किया जा सकता। इस बारे में अब सरकार ही कुछ कर सकती है। - अशोक सिंह, डायरेक्टर लॉ, नगर निगम

हस्तक्षेप करे सरकार राज्य सरकार के शहरी व विकास विभाग को हस्तक्षेप कर समितियों का गठन करना चाहिए। चूंकि विकास व सफाई कार्य आमजन से जुड़े हुए हैं और इस संबंध में यदि कोई कानूनी प्रावधान बनाए गए हैं, तो उनका पालन करवाया जाना चाहिए। - केएस राठौड़, पूर्व न्यायाधीश राजस्थान, हाई कोर्ट

..और शहर के विधायक

क्या करना था: जयपुर शहर के 6 भाजपा व 2 कांग्रेस विधायक नगर निगम के आमंत्रित सदस्यों में हैं और निगम की राजनीतिक गतिविधियों में पूरा दखल रखते हैं। वे समिति गठन के मामले में महापौर व भाजपा पार्षदों के बीच सहमति बना सकते थे।

क्या किया : दोनों ही दलों के विधायक अपने-अपने खास पार्षदों को समिति अध्यक्ष बनाने के जुगाड़ में जुटे रहे। भाजपा ने जब समिति अध्यक्षों के नाम प्रस्तावित किए तो कांग्रेस के विधायक भी अपने पार्षदों को अध्यक्ष बनाने पर अड़ गए। नतीजतन समितियों का मामला लटका रहा।

सत्ता का खेल, बिसात पर हम

बाबूलाल शर्मा/भरत.

जयपुर नगर निगम के चुनावों को आठ माह बीत जाने के बावजूद अभी तक समितियों का गठन नहीं होने से शहर का विकास बुरी तरह प्रभावित हो गया है। नगर निगम में अलग-अलग कार्यो के लिए कुल 14 समितियों का गठन होना था, जिसमें से 6 समितियां तो अनिवार्य मानी जाती हैं, लेकिन महापौर कांग्रेस की और बोर्ड भाजपा का होने से राजनीति का अखाड़ा बने निगम में समिति गठन का मामला गौण हो गया है। समय पर समितियां गठित नहीं करने के मामले में अदालत महापौर और निगम प्रशासन पर जुर्माना भी लगा चुकी है। इतना ही नहीं अदालत ने दोनों पक्षों को आपसी सहमति से मामला निपटाने के लिए भी कहा, लेकिन महापौर और बोर्ड के बीच तालमेल नहीं बैठ पा रहा है।

ऐसे में कैसे बनेगा जयपुर वर्ल्ड क्लास सिटी

जयपुर को वर्ल्ड क्लास सिटी का तमगा दिलाने का राग तो खूब अलापा जा रहा है, लेकिन इसके लिए न तो नीति निर्धारण हो रहा और न ही राजस्व के रास्ते खुल रहे। और तो और शहर के विकास का भी अभी तक बजट पास नहीं हुआ। आर्थिक बदहाली के चलते बड़े प्रोजेक्ट की प्लानिंग तो दूर निगम का प्राथमिक दायित्व सफाई, रोशनी, सड़क व नाली निर्माण जैसे कामों पर भी किसी का ध्यान नहीं है। समिति गठन के मामले को निबटाने के बजाय भाजपा-कांग्रेस निगम को विकास की दिशा देने के बजाय स्वार्थ की राजनीति में उलझाए हुए हैं। इसी का परिणाम है कि तीन बार हुई बोर्ड की बैठक में विकास का एक भी प्रस्ताव पास नहीं हुआ।

यह हो रहा है नुकसान

वित्त समिति नहीं होने से बजट पास नहीं हो पाया, राजस्व की व्यवस्था नहीं हो पाई। बोर्ड में 804 करोड़ रुपए के बजट प्रस्ताव गए थे, लेकिन मंजूरी नहीं मिली। गृहकर समिति अस्तित्व में नहीं होने से नगरीय विकास कर, गृहकर व अन्य कर की वसूली नहीं हो पाई। लक्ष्य के अनुरूप वसूली नहीं होने से 171 करोड़ रुपए का यूडी टैक्स और 234 करोड़ का हाउस टैक्स बकाया चल रहा है। बिल्डिंग प्लान कमेटी नहीं बनने से भवन मानचित्र अनुमोदन के मामले अटके हुए हैं।

पिछले एक साल से बीपीसी में 90 मामले अटके हुए हैं, इससे बिल्डर्स का 500 करोड़ का नुकसान हो रहा है। अतिक्रमण निरोधक व सतर्कता समिति नहीं होने से अवैध निर्माणों की मॉनिटरिंग नहीं हो रही। धड़ाधड़ हो रहे अतिक्रमणों से शहर का हैरिटेज स्वरूप नष्ट हो रहा है। अदालत भी अवैध निर्माणों पर अंकुश लगाने के लिए निगम सीईओ व अन्य अधिकारियों को कई बार फटकार लगा चुकी है।

लाइसेंस समिति नहीं बनने से 475 मामले लंबित पड़े हुए हैं। इससे होटलों व ढाबों को फूड लाइसेंस, मीट लाइसेंस, डेयरी अनुमति व थड़ियों को लाइसेंस नहीं मिल रहे हैं। सफाई समिति नहीं बनने से शहर की सफाई व्यवस्था का बुरा हाल हैं। अधिकारियों पर कोई नियंत्रण नहीं है। सफाईकर्मियों की भर्ती का मामला दो साल से अटका हुआ है। कचरा परिवहन के ठेकेदार हड़ताल पर चले गए। मानसून पूर्व नालों की सफाई नहीं हो पाई। भारी बारिश हुई तो निचले इलाके डूब सकते हैं।

गतिरोध के पांच प्रमुख कारण

सबसे बड़ा कारण महापौर ज्योति खंडेलवाल को सत्ता के विकेंद्रीकरण का डर है। इसकी असल वजह यह है कि यदि वे समिति गठन के मुद्दे पर सहमत होती हैं तो बहुमत के आधार पर अध्यक्ष पदों पर भाजपा का कब्जा होगा। नए प्रोजेक्ट भी समिति अध्यक्ष तय करेंगे। बोर्ड में गए प्रस्ताव को भाजपा के संख्याबल के आधार पर मंजूरी मिलेगी। चूंकि भाजपा बहुमत में है, ऐसे में भाजपा की मनमानी चलेगी। मौजूदा हाल में निगम में सत्ता की धुरी सिर्फ महापौर के इर्द-गिर्द घूम रही है।

यदि समितियों का गठन हुआ तो भाजपा पार्षद दल और उप महापौर का प्रभाव बढ़ जाएगा। समिति चेयरमैन बनने पर गाड़ी, स्टाफ आदि की सुविधा तो मिलेगी ही साथ ही अधिकारी वर्ग भी उनके प्रभाव में रहेगा। कानून है कि चुनाव के बाद 90 दिन में भी महापौर समितियों का गठन नहीं कर पाए तो राज्य सरकार हस्तक्षेप करेगी और खुद समितियों का गठन कराएगी। इसका नगर पालिका एक्ट की धारा 55(5) में स्पष्ट उल्लेख है लेकिन समितियों के गठन के मामले में राज्य सरकार अपनी भूमिका से पीछे हट गई। प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता है और निगम में महापौर भी कांग्रेस का है। ऐसे में सरकार नहीं चाहती कि निगम में भाजपा का वर्चस्व बढ़े।

शहर के कांग्रेस व भाजपा विधायक व सांसद नगर निगम बोर्ड में आमंत्रित सदस्य होने की हैसियत से बोर्ड और महापौर के बीच कड़ी का काम कर सकते हैं, लेकिन वे भी दलगत राजनीति में उलझे हुए हैं और विकास के मुद्दे पर चुपी साधे हैं। भाजपा के पार्षदों में अंदरखाने चल रही गुटबाजी समितियों के गठन के मुद्दे को कमजोर कर रही है। अदालत की दखल के बाद साधारण सभा में आए समिति गठन के प्रस्ताव पर भाजपा के पार्षद आपस में ही उलझ गए। महापौर ने बाद में यह कह कर प्रस्ताव खारिज कर दिया कि यह प्रस्ताव की शक्ल में था ही नहीं। जबकि यह प्रस्ताव डिप्टी मेयर की तरफ से रखा गया था। इसे लेकर भाजपा पार्षदों ने अलाकमान तक शिकायतें भी पहुंचाई।

गुरुवार, 6 मई 2010

2000 करोड़ की पड़ेगी सलाह!

संजय सैनी
bhaskarजयपुर. अगर योजना आयोग की मंशा पर अमल हुआ तो राजधानी में बस रैपिड ट्रांसपोर्ट सिस्टम (बीआरटीएस) और मेट्रो ट्रेन के मार्ग में भारी बदलाव हो सकता है, यानी सारी कवायद नए सिरे से शुरू करनी पड़ सकती है। लिहाजा बीआरटीएस व मेट्रो की लागत 7 हजार करोड़ रु. से बढ़कर 9 हजार करोड़ रु. तक हो सकती है।


आयोग चाहता है कि बीआरटीएस जेएलएन मार्ग पर और मेट्रो टोंक रोड पर चले। उसके सलाहकार (इन्फ्रास्ट्रक्चर) गजेन्द्र हल्दिया ने पिछले दिनों जेडीए अधिकारियों के साथ हुई समीक्षा बैठक में इस मंशा को जाहिर कर दिया है। हल्दिया जानना चाह रहे थे कि बीआरटीएस का काम क्यों रोका गया। जब उन्हें बताया गया कि टोंक रोड पर जगह की कमी के कारण बीआरटीएस आगे नही बढ़ पा रहा है, तो उन्होंने सुझाव दिया कि जगह की कमी को देखते हुए जेडीए को जेएलएन मार्ग का उपयोग करना चाहिए। इससे कॉरिडोर बनाने में दिक्कत नहीं होगी और बसें भी आसानी से चल सकेंगी। चूंकि टोंक रोड पर यातायात अधिक रहने के कारण मेट्रो को एलीवेटेड ट्रैक पर लाया जा रहा है तो कोई दिक्कत नहीं आएगी।


पहले चरण में न्यू गेट से एयरपोर्ट तक : इस सुझाव को देखते हुए जेडीए ने बीआरटीएस की बसों को जेएलएन मार्ग पर उतारने की तैयारी भी कर ली है। नई खेप आने के बाद इस रूट पर बसों को चलाया जाएगा। पहले चरण में बीआरटीएस की बसें न्यू गेट से एयरपोर्ट तक चलाई जाएंगी। वर्तमान में जो बसें चल रही हैं उनका रास्ता बदलकर जेएलएन मार्ग पर लाया जाएगा। एयरपोर्ट पर फ्लाइट के आने-जाने के समय बसों की संख्या बढ़ा दी जाएगी।


वीआईपी मार्ग नहीं रहेगा : जेएलएन मार्ग पर बीआरटीएस सिस्टम आने के बाद यह वीआईपी मार्ग नहीं रहेगा। यह बात जेडीए के अधिकारियों ने गजेन्द्र हल्दिया को बताई थी, लेकिन उनका यह तर्क उनके गले नहीं उतरा। उनका कहना था कि जब सड़क पर यातायात ठीक करना है और ट्रैफिक को कंट्रोल करना है तो जेएलएन मार्ग पर बीआरटीएस लाना पड़ेगा। वैसे भी बजाजनगर तक मेट्रो आ रही है तो बीआरटीएस भी आ सकती है।


कैसे लागू करेंगे : जयपुर में बीआरटीएस का काम आगे बढ़ाना है तो 300 करोड़ रु. की जरूरत के बारे में जेडीए ने नगरीय विकास विभाग को पत्र लिखा है। हालांकि पहले जेडीए के अधिकारियों को नगरीय विकास मंत्रालय को संतुष्ट करना होगा कि बीआरटीएस कैसे लागू करेंगे।


तैयार कोरिडोर एक साल से बंद: जेडीए ने सीकर रोड पर एक साल से बीआरटीएस कोरिडोर बना रखा है, पर इसमें बसें नहीं चलाई जा रही हैं। फिलहाल बीआरटीएस की बसों को उन मागरे पर चलाया जा रहा है जिन पर यात्री भार अधिक है। दूसरी खेप में आने वाली बसों को इस कोरिडोर में उतारा जाएगा।


लागू करने में दिक्कतें : जेडीए आयुक्त सुधांश पंत से जब इस मामले में बात की गई तो उनका कहना था कि यह सुझाव अच्छा है, लेकिन इसे लागू करने में कई दिक्कतें हैं। टोंक रोड पर बीआरटीएस का काफी काम हो गया है। दुर्गापुरा में एलीवेटेड बनाने का काम चल रहा है। टोंक रोड चौड़ी की जा रही है। न्यू गेट से एयरपोर्ट तक बसें चलाई जा सकती हैं। जेसीटीएसएल इस दिशा में काम कर रहा है। बाकी फैसला करने का काम सरकार का है।

साइबर क्राइम, बेबस पुलिस

Bhaskar News
साइबर क्राइम की घटनाओं में दिन-प्रतिदिन बढ़ोतरी हो रही है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आदर्श नगर थाने में पिछले तीन दिन में ही साइबर क्राइम से संबंधित तीन शिकायतें पहुंची हैं। हालांकि पहले की तरह इस संबंध में भी केस दर्ज नहीं किया गया। वहीं पुलिस को साइबर अपराधियों पर अंकुश लगाने के लिए न तो नए साइबर कानून की जानकारी है और न ही ट्रेनिंग की कोई योजना। यहां तक कि जयपुर बम विस्फोट के बाद की गई साइबर सेल की घोषणा का अब तक अता-पता नहीं है।


- मोहल्ला लाइव डॉट कॉम पर पत्रकार श्रीपाल शक्तावत के खिलाफ अनर्गल भाषा लिखने वाले ने फर्जी आईडी का इस्तेमाल किया। उन्होंने इस मामले में साइबर लॉ एक्सपर्ट की सलाह से महेश नगर पुलिस थाने में आईटी एक्ट के तहत साइट के मालिक पर मामला दर्ज कराया। जांच आईजी की सीआईयू टीम के पास है।


- जयपुर की तृप्ति का किसी ने फेसबुक पर अकाउंट खोलकर उसकी कई फोटो डाल दीं। साथ ही कई लड़कों के मेल आईडी पर फेंड्रशिप रिक्वेस्ट भेज दी तथा फोन नंबर दे दिए। जब फोन आने लगे तो उसने मामला दर्ज कराया। पुलिस फर्जी अकाउंट बनाने वाले का पता नहीं लगा पाई हैं।


- उदयपुर के होटल उदयविलास व बीकानेर के दो होटलों को ई—मेल से पिछले दिनों धमकियां मिलीं। जांच प्रदेश की एटीएस पुलिस कर रही है। ई—मेल के लिए प्रॉक्सी सर्वर तो यूरोप का इस्तेमाल किया है। अभी तक तो एटीएस को गूगल से आईपीकोड तक का एड्रेस नहीं मिल पाया है।


ये तो उदाहरण मात्र हैं, जिनमें पुलिस साइबर क्राइम के मामले सुलझाने में उलझी हुई है। भास्कर ने आईटी एक्ट के तहत दर्ज होने वाले मामलों की पड़ताल की तो चौंकाने वाली जानकारी सामने आई। प्रदेश में अभी तक साइबर क्राइम सेल का गठन तक नहीं हुआ है, जबकि पिछले दिनों संशोधित आईटी एक्ट 2008 में केंद्र सरकार ने प्रावधान जोड़ते हुए इतना सख्त कर दिया है कि स्पेम मेल भेजने वालों तक के खिलाफ मामला दर्ज करने को लेकर पुलिस को आदेश जारी कर दिए।


ककहरा नहीं जानते साइबर लॉ का


राजस्थान यूनिवर्सिटी में साइबर लॉ के बारे में कोई पाठ्यक्रम नहीं है। यूनिवर्सिटी में विधि की पढ़ाई शुरू हुए 60 साल हो चुके हैं, लेकिन शिक्षकों को ही साइबर अपराध का ककहरा तक मालूम नहीं है। हालांकि अगले साल से इस कानून को पाठ्यक्रम में शामिल करने पर विचार चल रहा है। दूसरी ओर एक संस्था ने राजस्थान यूनिवर्सिटी के लिए 65 लाख की लागत का साइबर कानून सॉफ्टवेयर तैयार कर रखा है।


हर साल निकलते हैं एक हजार विधि स्नातक : यूनिवर्सिटी के लॉ कॉलेज से ही हर साल करीब एक हजार विधि स्नातक पास होते हैं, लेकिन साइबर क्राइम की पैरवी से सभी अनजान।


इंटरनेशनल लॉ पढ़ते, साइबर लॉ नहीं : यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल लॉ के तहत विद्यार्थियों को अन्तरराष्ट्रीय विवाद, समझौते, संधियां आदि तो पढ़ाया जाता है, लेकिन साइबर कानून की जानकारी देने वाला कोई नहीं है।


कैसे पकड़ते हैं अपराधी : साइबर क्राइम इन्वेस्टीगेटर कैलाश सोनगरा के अनुसार क्राइम की सूचना पर सबसे पहले उसका इंटरनेट प्रोटोकॉल मालूम किया जाता है। उसके बाद संबंधित टेलीफोन कम्पनी से इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर की रिपोर्ट मांगते है। रिपोर्ट के आधार पर सर्विस प्रोवाइडर से कैफे या घर से की गई वारदात की टाइम व डेट ली जाती है। इससे यह पता चल जाता है कि इंटरनेट प्रोटोकॉल किसके नाम जारी हुई है। आईपी से पता मिलने के आधार पर पुलिस अपराधी को पकड़ लेती है।
 

आंखें बंद, क्राइम खत्म

डूंगरसिंह राजपुरो�
जयपुर. साइबर क्राइम के प्रति पुलिस कितनी सजग है, इसका अंदाजा आदर्श नगर थाना पुलिस के रवैये से लगाया जा सकता है। पिछले दो दिन से आदर्शनगर थानाधिकारी और अन्य स्टाफ से भास्कर रिपोर्टर पूछते रहे कि थाने में पिछले कुछ दिनों में साइबर क्राइम का कोई मामला सामने आया है क्या? सभी एक जुबान में बोलते रहे कि मामला दर्ज होना तो दूर, शिकायत तक लेकर कोई नहीं आया।

गुरुवार शाम थानाधिकारी ने कहा कि एक मामला सामने आया है, जबकि हकीकत यह है कि 29 और 30 अप्रैल को ही चार हाईप्रोफाइल परिवारों ने चार अलग-अलग शिकायतें हैं। तेजी से पनप रहे अपराध ने नए चेहरे साइबर क्राइम को रोकने और अपराधियों पर नकेल कसने के प्रति अन्य थानों का हाल भी आदर्श नगर जैसा ही है। सभी थाने की पुलिस पिछले पांच साल में आईटी एक्ट के तहत केवल 10 मुकदमे दर्ज करने की जानकारी दे रही है, जबकि साइबर क्राइम के जानकारों का कहना है कि पिछले छह माह में ही 17 शिकायतें की गई हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर साइबर क्राइम के मामलों को पुलिस क्यों छुपाती है?

आईडी हैक, लड़कियों से दोस्ती : आदर्शनगर निवासी सविता (परिवर्तित नाम) की याहू पर बनी आईडी किसी ने हैक की। उसके बाद स्पूफिंग से उसी के नाम से नकली आईडी बनाई। फिर सविता की जितनी लड़कियां मित्र हैं, उनको मित्रता के संदेश भेजे और सविता का फेसबुक पर एकाउंट बना हाईप्रोफाइल लोगों को लड़की के नाम से लुभाना शुरू कर दिया। 22 अप्रैल को मित्रों से आईडी के दुरुपयोग का पता लगने के बाद से सविता और उनके परिवारजन मानसिक पीड़ा झेल रहे हैं। सविता की मां ने भी आदर्शनगर थाने में शिकायत की है। वह बार-बार एक ही बात कहती हैं कि अपराधी का पता लगाकर ही रहेंगी।

छीन लिया सुकून : तिलकनगर निवासी सृष्टि (परिवर्तित नाम) के नंबर पर कोई देर रात फोन कर अश्लील बातें करता है। असल में किसी ने फेसबुक एकाउंट से सृष्टि का फोटो व मेल आईडी चुराकर उसी के नाम से नकली फेसबुक एकाउंट खोल दिया। आईडी स्पूफ (चोरी) करने वाले ने सृष्टि से मोबाइल नंबर आदि पर्सनल डिटेल लेने के बाद सृष्टि के फर्जी आईडी से सैकड़ों लोगों को मेल कर दिए। इतना ही नहीं फर्जी फेसबुक पर सृष्टि के 18 मित्र भी बना दिए। हाईप्रोफाइल घर की सृष्टि की शादीशुदा जिंदगी तनाव में है। पीड़िता के पति ने 30 अप्रैल को आदर्श नगर थाने में शिकायत की।

बस एक ही मामला

आदर्शनगर एसएचओ अजय शर्मा से सवाल

आपके थाने में पिछले सप्ताह साइबर क्राइम के कितने मामले दर्ज हुए?
नहीं, एक भी नहीं।

इंटरनेट के माध्यम से फेसबुक एकाउंट चोरी, मेल आईडी व पासवर्ड चोरी का कोई मामला दर्ज नहीं हुआ?
फेसबुक एकाउंट का एक मामला आया था, हम जांच करा रहे हैं, डिटेल सामने आने पर एफआईआर दर्ज करेंगे।

एक ही मामला है या ज्यादा हैं?
नहीं, बस एक ही मामला है।

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

62 साल से महिला कलेक्टर-एसपी का इंतजार

बाबूलाल शर्मा
जयपुर . राज्यपाल, मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष और मुख्य सचिव जैसे सर्वोच्च पदों पर महिलाएं जहां खुद को साबित कर चुकी हैं, उसी प्रदेश की राजधानी जयपुर के लिए यह हैरानी की बात है कि आज तक एक भी महिला कलेक्टर और एसपी के पद पर नहीं रही। काबिलेगौर है कि जयपुर में इन पदों  सृजित हुए 62 साल हो चुके हैं।


यदि मामला राजधानी की संवेदनशीलता या प्रशासनिक पेचीदगियों का भी हो तो जयपुर से कहीं ज्यादा संवेदनशील माने जाने वाले टोंक में कलेक्टर और एसपी दोनों महिला अफसरों की मौजूदगी से यह बात खारिज हो जाती है। यही नहीं अजमेर जैसे संवेदनशील जिले में अब तक चार महिलाएं कलेक्टर और श्रीगंगानगर में उस समय महिला एसपी तैनात थी जब घड़साना में हिंसक आंदोलन चरम पर था। जयपुर में डिवीजनल कमिoAर के अहम पद पर महिला आईएएस तैनात हैं, महापौर भी महिला हैं लेकिन राजधानी को अभी भी कलेक्टर-एसपी का इंतजार है।


अब तक 22 जिलों में महिलाएं कलेक्टर: राजस्थान कैडर की वर्तमान में 28 महिला आईएएस हैं। इनमें से पांच दिल्ली में नियुक्त हैं। राज्य में 22 जिलों में महिलाएं कलेक्टर रह चुकी हैं। वर्तमान में बूंदी, बीकानेर, भीलवाड़ा व टोंक में महिला कलेक्टर हैं।


11 जिलों को नहीं मिली कमान : राजधानी जयपुर समेत ऐसे 11 जिले हैं जिनमें कभी महिला आईएएस कलेक्टर के पद पर नियुक्ति नहीं हुई। इन जिलों में उदयपुर, अलवर, झुन्झुनूं, जोधपुर, बारां, चूरू, झालावाड़, प्रतापगढ़, बाड़मेर, और जैसलमेर शामिल हैं।


13 आईपीएस महिलाएं : जयपुर में आज तक कोई महिला अफसर फील्ड पोस्टिंग में एसपी नहीं लगी। प्रदेश में कुल 159 आईपीएस हैं जिनमें से 13 आईपीएस महिलाएं हैं। राजस्थान कैडर की पहली महिला आईपीएस 1989 मे नीना सिंह बनीं। इससे पहले एकमात्र आईपीएस बादाम बैरवा रही थीं। जो आरपीएस से आईपीएस बनी। प्रदेश में 12 जिले ऐसे हैं जहां महिलाओं ने पुलिस की कमान संभाली।


वर्तमान में तमिलनाडु में लतिका शरण पुलिस महानिदेशक के पद पर हैं, यही नहीं उत्तराखंड में भी कंचन चौधरी डीजीपी रह चुकी हैं तो फिर जयपुर में अभी तक किसी महिला आईपीएस को फील्ड पोस्टिंग के रूप में एसपी नहीं लगाना चिंताजनक है। जयपुर की पहली पुलिस कमिश्नर महिला आईपीएस बने।
- पीके तिवारी, रिटायर्ड डीजीपी, राजस्थान


पूर्व मुख्य सचिव रह चुकी कुशल सिंह कोटा में कलेक्टर रही थीं, अजमेर, बीकानेर, उदयपुर संभाग मुख्यालयों पर जब कलेक्टर का काम महिलाएं बखूबी संभाल चुकी हैं तो जयपुर में भी कलेक्टर के पद पर किसी महिला अफसर को लगाने में क्या हर्ज है?


- इंद्रजीत खन्ना, पूर्व मुख्य सचिव, राजस्थान

रविवार, 25 अप्रैल 2010

सांसद, कलेक्टर-एसपी के घर भी दूषित पानी

बाबूलाल शर्मा
जयपुर. क्या आप यकीन करेंगे- शहर का आम आदमी ही नहीं बल्कि सांसद, कलेक्टर, विधानसभा सचिव और पुलिस अधीक्षक तक प्रदूषित पानी पी रहे हैं। यह खुलासा भास्कर की ओर से कराई गई पानी की जांच में हुआ है। हां, राज्य के मुख्य सचिव और डीजीपी के घरों में जलदाय विभाग साफ पानी की सप्लाई कर रहा है।


भास्कर ने मुख्य सचिव टी श्रीनिवासन, डीजीपी हरीश चंद्र मीणा, सांसद महेश जोशी,न्यायाधिपति प्रेमशंकर आसोपा, कलेक्टर कुलदीप रांका, एसपी (साउथ) जोस मोहन व विधानसभा सचिव एच आर कुड़ी के बंगलों, नगर निगम मुख्यालय व एसएमएस अस्पताल परिसर से पानी के सैंपल लेकर इनकी ज्ञान विहार यूनिवर्स की प्रयोगशाला में जांच कराई तो परिणाम हैरान करने वाले निकले। मुख्य सचिव व पुलिस महानिदेशक के बंगलों के ही सैंपल तय मानकों पर खरे उतरे, बाकी 7 नमूनों में हानिकारक तत्व पाए गए।

सांसद, विधानसभा सचिव , न्यायाधीश , कलेक्टर तथा एसपी के बंगले के पानी में प्रदूषक तत्वों की मात्रा मिली। इनके यहां अपारदर्शी (गंदला) पानी मिला। इस पानी में स्माल पार्टिकल और स्लाइट व मोर टर्बिडिटी के रूप में मिले आर्गेनिक पोल्यूटेंट्स के लगातार इस्तेमाल से इन बंगलों में रह रहे लोगों की सेहत गड़बड़ा सकती है। वहीं नगर निगम मुख्यालय में आम जन के लिए लगाए गए वाटर कूलर में मोर टर्बिड यानी सर्वाधिक प्रदूषक तत्व मिले हैं। एसएमएस अस्पताल में बांगड़ के बाहर सार्वजनिक नल का पानी भी पीने योग्य नहीं है। डीजीपी, कलेक्टर, निगम मुख्यालय और एसएमएस अस्पताल परिसर के पानी में क्षारीय व अम्लीय तत्व भी बॉर्डर लाइन पर है।


जांच में कलेक्टर, एसपी, विधानसभा सचिव के बंगलों और नगर निगम मुख्यालय में सब रजिस्ट्रार कार्यालय के पास लगे वाटर कूलर के पानी में टीडीएस की मात्रा भी खतरनाक स्थिति में है। अमेरिकन स्टैंडर्डस के मुताबिक पानी में 500 एमजी/लीटर तथा डब्ल्यूएचओ के अनुसार 600 एमजी/लीटर तक टोटल डिजोल्वड सोलिड (टीडीएस) होना चाहिए लेकिन यहां इसकी मात्रा 800 के ऊपर हैं, वहीं निगम मुख्यालय के पानी में तो यह मात्रा 1200 को भी पार कर गई। दिलचस्प तथ्य यह है कि राजस्थान में भी टीडीएस की स्वीकार्य सीमा 500 एमजी/लीटर ही है, लेकिन अधिकतम सीमा बढ़कर 2000 तक हो गई। विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही अधिकतम सीमा 2000 हो, लेकिन डब्ल्यूएचओ के अनुसार ६00 से ऊपर टीडीएस सेहत के लिए खतरनाक है।


मुख्य सचिव, डीजीपी के यहां साफ पानी


पानी की सैंपल जांच में जहां सांसद, कलेक्टर और अन्य अफसरों के यहां प्रदूषित पानी मिला वहीं राज्य के मुख्य सचिव और डीजीपी के बंगलों में जलदाय विभाग साफ पानी सप्लाई कर रहा है। इनके यहां न तो टर्बिडिटी पाई गई और न ही अन्य प्रदूषक तत्व। आश्चर्यजनक तथ्य यह भी है कि इन दोनों ही जगह पर लिए गए सैंपल न सिर्फ अमेरिकन स्टैंडर्ड बल्कि इंडियन स्टैंडर्ड के अनुसार भी खरे साबित हुए। यहां डीडीएस की मात्रा क्रमश: 422 और 354 थी जबकि परमानेंट हार्डनेस भी स्टैंडर्ड के दायरे में मिली।


बीसलपुर से आता है साफ पानी, जलदाय विभाग कर देता है गंदा


भास्कर ने आला अधिकारियों के अलावा बीसलपुर से आने वाले पानी की जलदाय विभाग की गांधीनगर स्थित प्रयोगशाला में भी जांच कराई। ये सैंपल बीसलपुर प्रोजेक्ट के बालावाला पंप हाउस पर बने स्टोरेज टैंक, जवाहर सर्किल पर बने स्टोरेज टैंक और मालवीय नगर सेक्टर दो से लिए गए। जांच में बीसलपुर से आने वाला पानी मानकों पर खरा उतरा है। ऐसे में सवाल उठता है कि बीसलपुर से जयपुर में आने के बाद घरों में जो पानी पहुंच रहा है क्या वह जलदाय विभाग की जर्जर हो चुकी लाइनों के कारण प्रदूषित हो रहा है? क्योंकि अब तक दूषित पानी के जितने भी मामले सामने आए हैं, उनमें सीवरेज लाइनों की मिक्सिंग प्रमुख कारण रहा है। पीएचईडी की प्रयोगशाला में सीनियर केमिस्ट सीमा गुप्ता ने जांच रिपोर्ट सौंपते हुए कहा कि बीसलपुर के पानी के सैंपल पूरी तरह प्रदूषण मुक्त है।


टर्बीडिटी क्या?


पानी में टर्बीडिटी इसमें पाए जाने वाले तत्वों के कारण होती है, जो पानी को गंदला बना देती है। इनमें रेत और अन्य तत्वों के कण शामिल हैं। 5 एनटीयू से कम टर्बीडिटी वाला पानी ही पीने के लिहाज से ठीक है।


विशेषज्ञों ने बताया- बीमारियों का पानी


9 सैंपलों में से 7 में टर्बिडी मिली। चार सैंपलों में


टीडीएस की मात्रा यूएसए स्टैंडर्ड 500 के बजाय 800 और 1200 एमजी प्रति लीटर मिली, जो पेट की बीमारियां का प्रमुख कारण है। सभी सैंपलों में जल की स्थायी कठोरता तय मापदंड से ज्यादा है, जो हड्डियों, पित्ताशय, लीवर और गुर्दो के लिए खतरा है।


- डॉ. आर. सी. छीपा, सेंटर हैड (सीएडब्ल्यूएम), ज्ञान विहार यूनिवर्स, जयपुर


ज्यादा टर्बिड पानी प्रदूषित तत्वों की मात्रा ज्यादा होती है। इस पानी के क्लोरीनेशन के बावजूद बैक्टीरिया जीवित रह जाते हैं और वे शरीर में जाकर गंभीर बीमरियां फैला सकते हैं।


— डॉ. एस. एस. ढींढसा, रिटायर्ड चीफ केमिस्ट, पीएचईडी प्रयोगशाला, जयपुर