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गुरुवार, 6 मई 2010

साइबर क्राइम, बेबस पुलिस

Bhaskar News
साइबर क्राइम की घटनाओं में दिन-प्रतिदिन बढ़ोतरी हो रही है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आदर्श नगर थाने में पिछले तीन दिन में ही साइबर क्राइम से संबंधित तीन शिकायतें पहुंची हैं। हालांकि पहले की तरह इस संबंध में भी केस दर्ज नहीं किया गया। वहीं पुलिस को साइबर अपराधियों पर अंकुश लगाने के लिए न तो नए साइबर कानून की जानकारी है और न ही ट्रेनिंग की कोई योजना। यहां तक कि जयपुर बम विस्फोट के बाद की गई साइबर सेल की घोषणा का अब तक अता-पता नहीं है।


- मोहल्ला लाइव डॉट कॉम पर पत्रकार श्रीपाल शक्तावत के खिलाफ अनर्गल भाषा लिखने वाले ने फर्जी आईडी का इस्तेमाल किया। उन्होंने इस मामले में साइबर लॉ एक्सपर्ट की सलाह से महेश नगर पुलिस थाने में आईटी एक्ट के तहत साइट के मालिक पर मामला दर्ज कराया। जांच आईजी की सीआईयू टीम के पास है।


- जयपुर की तृप्ति का किसी ने फेसबुक पर अकाउंट खोलकर उसकी कई फोटो डाल दीं। साथ ही कई लड़कों के मेल आईडी पर फेंड्रशिप रिक्वेस्ट भेज दी तथा फोन नंबर दे दिए। जब फोन आने लगे तो उसने मामला दर्ज कराया। पुलिस फर्जी अकाउंट बनाने वाले का पता नहीं लगा पाई हैं।


- उदयपुर के होटल उदयविलास व बीकानेर के दो होटलों को ई—मेल से पिछले दिनों धमकियां मिलीं। जांच प्रदेश की एटीएस पुलिस कर रही है। ई—मेल के लिए प्रॉक्सी सर्वर तो यूरोप का इस्तेमाल किया है। अभी तक तो एटीएस को गूगल से आईपीकोड तक का एड्रेस नहीं मिल पाया है।


ये तो उदाहरण मात्र हैं, जिनमें पुलिस साइबर क्राइम के मामले सुलझाने में उलझी हुई है। भास्कर ने आईटी एक्ट के तहत दर्ज होने वाले मामलों की पड़ताल की तो चौंकाने वाली जानकारी सामने आई। प्रदेश में अभी तक साइबर क्राइम सेल का गठन तक नहीं हुआ है, जबकि पिछले दिनों संशोधित आईटी एक्ट 2008 में केंद्र सरकार ने प्रावधान जोड़ते हुए इतना सख्त कर दिया है कि स्पेम मेल भेजने वालों तक के खिलाफ मामला दर्ज करने को लेकर पुलिस को आदेश जारी कर दिए।


ककहरा नहीं जानते साइबर लॉ का


राजस्थान यूनिवर्सिटी में साइबर लॉ के बारे में कोई पाठ्यक्रम नहीं है। यूनिवर्सिटी में विधि की पढ़ाई शुरू हुए 60 साल हो चुके हैं, लेकिन शिक्षकों को ही साइबर अपराध का ककहरा तक मालूम नहीं है। हालांकि अगले साल से इस कानून को पाठ्यक्रम में शामिल करने पर विचार चल रहा है। दूसरी ओर एक संस्था ने राजस्थान यूनिवर्सिटी के लिए 65 लाख की लागत का साइबर कानून सॉफ्टवेयर तैयार कर रखा है।


हर साल निकलते हैं एक हजार विधि स्नातक : यूनिवर्सिटी के लॉ कॉलेज से ही हर साल करीब एक हजार विधि स्नातक पास होते हैं, लेकिन साइबर क्राइम की पैरवी से सभी अनजान।


इंटरनेशनल लॉ पढ़ते, साइबर लॉ नहीं : यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल लॉ के तहत विद्यार्थियों को अन्तरराष्ट्रीय विवाद, समझौते, संधियां आदि तो पढ़ाया जाता है, लेकिन साइबर कानून की जानकारी देने वाला कोई नहीं है।


कैसे पकड़ते हैं अपराधी : साइबर क्राइम इन्वेस्टीगेटर कैलाश सोनगरा के अनुसार क्राइम की सूचना पर सबसे पहले उसका इंटरनेट प्रोटोकॉल मालूम किया जाता है। उसके बाद संबंधित टेलीफोन कम्पनी से इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर की रिपोर्ट मांगते है। रिपोर्ट के आधार पर सर्विस प्रोवाइडर से कैफे या घर से की गई वारदात की टाइम व डेट ली जाती है। इससे यह पता चल जाता है कि इंटरनेट प्रोटोकॉल किसके नाम जारी हुई है। आईपी से पता मिलने के आधार पर पुलिस अपराधी को पकड़ लेती है।
 

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