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सोमवार, 12 जुलाई 2010

सत्ता का खेल, बिसात पर हम

बाबूलाल शर्मा/भरत.

जयपुर नगर निगम के चुनावों को आठ माह बीत जाने के बावजूद अभी तक समितियों का गठन नहीं होने से शहर का विकास बुरी तरह प्रभावित हो गया है। नगर निगम में अलग-अलग कार्यो के लिए कुल 14 समितियों का गठन होना था, जिसमें से 6 समितियां तो अनिवार्य मानी जाती हैं, लेकिन महापौर कांग्रेस की और बोर्ड भाजपा का होने से राजनीति का अखाड़ा बने निगम में समिति गठन का मामला गौण हो गया है। समय पर समितियां गठित नहीं करने के मामले में अदालत महापौर और निगम प्रशासन पर जुर्माना भी लगा चुकी है। इतना ही नहीं अदालत ने दोनों पक्षों को आपसी सहमति से मामला निपटाने के लिए भी कहा, लेकिन महापौर और बोर्ड के बीच तालमेल नहीं बैठ पा रहा है।

ऐसे में कैसे बनेगा जयपुर वर्ल्ड क्लास सिटी

जयपुर को वर्ल्ड क्लास सिटी का तमगा दिलाने का राग तो खूब अलापा जा रहा है, लेकिन इसके लिए न तो नीति निर्धारण हो रहा और न ही राजस्व के रास्ते खुल रहे। और तो और शहर के विकास का भी अभी तक बजट पास नहीं हुआ। आर्थिक बदहाली के चलते बड़े प्रोजेक्ट की प्लानिंग तो दूर निगम का प्राथमिक दायित्व सफाई, रोशनी, सड़क व नाली निर्माण जैसे कामों पर भी किसी का ध्यान नहीं है। समिति गठन के मामले को निबटाने के बजाय भाजपा-कांग्रेस निगम को विकास की दिशा देने के बजाय स्वार्थ की राजनीति में उलझाए हुए हैं। इसी का परिणाम है कि तीन बार हुई बोर्ड की बैठक में विकास का एक भी प्रस्ताव पास नहीं हुआ।

यह हो रहा है नुकसान

वित्त समिति नहीं होने से बजट पास नहीं हो पाया, राजस्व की व्यवस्था नहीं हो पाई। बोर्ड में 804 करोड़ रुपए के बजट प्रस्ताव गए थे, लेकिन मंजूरी नहीं मिली। गृहकर समिति अस्तित्व में नहीं होने से नगरीय विकास कर, गृहकर व अन्य कर की वसूली नहीं हो पाई। लक्ष्य के अनुरूप वसूली नहीं होने से 171 करोड़ रुपए का यूडी टैक्स और 234 करोड़ का हाउस टैक्स बकाया चल रहा है। बिल्डिंग प्लान कमेटी नहीं बनने से भवन मानचित्र अनुमोदन के मामले अटके हुए हैं।

पिछले एक साल से बीपीसी में 90 मामले अटके हुए हैं, इससे बिल्डर्स का 500 करोड़ का नुकसान हो रहा है। अतिक्रमण निरोधक व सतर्कता समिति नहीं होने से अवैध निर्माणों की मॉनिटरिंग नहीं हो रही। धड़ाधड़ हो रहे अतिक्रमणों से शहर का हैरिटेज स्वरूप नष्ट हो रहा है। अदालत भी अवैध निर्माणों पर अंकुश लगाने के लिए निगम सीईओ व अन्य अधिकारियों को कई बार फटकार लगा चुकी है।

लाइसेंस समिति नहीं बनने से 475 मामले लंबित पड़े हुए हैं। इससे होटलों व ढाबों को फूड लाइसेंस, मीट लाइसेंस, डेयरी अनुमति व थड़ियों को लाइसेंस नहीं मिल रहे हैं। सफाई समिति नहीं बनने से शहर की सफाई व्यवस्था का बुरा हाल हैं। अधिकारियों पर कोई नियंत्रण नहीं है। सफाईकर्मियों की भर्ती का मामला दो साल से अटका हुआ है। कचरा परिवहन के ठेकेदार हड़ताल पर चले गए। मानसून पूर्व नालों की सफाई नहीं हो पाई। भारी बारिश हुई तो निचले इलाके डूब सकते हैं।

गतिरोध के पांच प्रमुख कारण

सबसे बड़ा कारण महापौर ज्योति खंडेलवाल को सत्ता के विकेंद्रीकरण का डर है। इसकी असल वजह यह है कि यदि वे समिति गठन के मुद्दे पर सहमत होती हैं तो बहुमत के आधार पर अध्यक्ष पदों पर भाजपा का कब्जा होगा। नए प्रोजेक्ट भी समिति अध्यक्ष तय करेंगे। बोर्ड में गए प्रस्ताव को भाजपा के संख्याबल के आधार पर मंजूरी मिलेगी। चूंकि भाजपा बहुमत में है, ऐसे में भाजपा की मनमानी चलेगी। मौजूदा हाल में निगम में सत्ता की धुरी सिर्फ महापौर के इर्द-गिर्द घूम रही है।

यदि समितियों का गठन हुआ तो भाजपा पार्षद दल और उप महापौर का प्रभाव बढ़ जाएगा। समिति चेयरमैन बनने पर गाड़ी, स्टाफ आदि की सुविधा तो मिलेगी ही साथ ही अधिकारी वर्ग भी उनके प्रभाव में रहेगा। कानून है कि चुनाव के बाद 90 दिन में भी महापौर समितियों का गठन नहीं कर पाए तो राज्य सरकार हस्तक्षेप करेगी और खुद समितियों का गठन कराएगी। इसका नगर पालिका एक्ट की धारा 55(5) में स्पष्ट उल्लेख है लेकिन समितियों के गठन के मामले में राज्य सरकार अपनी भूमिका से पीछे हट गई। प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता है और निगम में महापौर भी कांग्रेस का है। ऐसे में सरकार नहीं चाहती कि निगम में भाजपा का वर्चस्व बढ़े।

शहर के कांग्रेस व भाजपा विधायक व सांसद नगर निगम बोर्ड में आमंत्रित सदस्य होने की हैसियत से बोर्ड और महापौर के बीच कड़ी का काम कर सकते हैं, लेकिन वे भी दलगत राजनीति में उलझे हुए हैं और विकास के मुद्दे पर चुपी साधे हैं। भाजपा के पार्षदों में अंदरखाने चल रही गुटबाजी समितियों के गठन के मुद्दे को कमजोर कर रही है। अदालत की दखल के बाद साधारण सभा में आए समिति गठन के प्रस्ताव पर भाजपा के पार्षद आपस में ही उलझ गए। महापौर ने बाद में यह कह कर प्रस्ताव खारिज कर दिया कि यह प्रस्ताव की शक्ल में था ही नहीं। जबकि यह प्रस्ताव डिप्टी मेयर की तरफ से रखा गया था। इसे लेकर भाजपा पार्षदों ने अलाकमान तक शिकायतें भी पहुंचाई।

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