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सोमवार, 12 जुलाई 2010

विकास ठप, खामोश सरकार

बाबूलाल शर्मा/भरत


जयपुर. महापौर और नगर निगम बोर्ड के असफल हो जाने के बाद अब समितियों के गठन का मामला राज्य सरकार के पाले में है।

निगम की मंगलवार को होने वाली साधारण सभा की बैठक में समिति गठन का प्रस्ताव एजेंडे में इसीलिए शामिल नहीं किया गया है क्योंकि महापौर द्वारा मांगी गई विधिक राय में सामने आया है कि बोर्ड गठन के 90 दिन बाद राज्य सरकार ही समितियों का गठन करने में सक्षम है। जबकि सरकार नहीं मूड में सरकार इस सोच पर काम कर रही है कि समितियों का मामला उलझाए रखा जाए ताकि भाजपा के पार्षदों के हाथों में फैसले का अधिकार नहीं जाए। यही कारण है कि समितियों का गठन करवाने के बजाय महापौर के अधिकार बढ़ाकर उसे और पावरफुल कर दिया है, ताकि एक करोड़ तक के वित्तीय फैसले वह कर सके। पहले महापौर के पास 25 लाख तक के ही वित्तीय स्वीकृति के अधिकार थे।

शुरू से ही दोहरी चाल

साधारण सभा में समिति गठन नहीं होने के बाद भाजपा पार्षद दल ने नगरीय विकास मंत्री शांति धारीवाल से गुहार की थी, लेकिन धारीवाल ने कहा था कि महापौर से इस संबंध में बात की जाएगी। अब आठ माह गुजर जाने के बाद भी इस मामले में सरकार के स्तर पर कोई पहल नहीं की जा रही। धारीवाल का कहना है कि समितियों का गठन करना महापौर और बोर्ड का काम है।

समितियों के गठन के बिना सड़क, सफाई या विकास से जुड़ा कोई भी कार्य संभव नहीं है। शहर की सरकार समितियां बनाकर ही विकास योजना तैयार करती है। फिर समितियों के अध्यक्ष उसको अमलीजामा पहनाते हैं और यही योजनाएं जयपुर शहर को रहनशील बनाती हैं। हैरानी है कि 7 महीने गुजर जाने के बाद भी अभी तक समितियों का अस्तित्व तक नहीं है। ऐसे में सवाल ये है कि वाकई जयपुर रहनशील शहर की श्रेणी में है।

13 का खेल

निगम की साधारण सभा मंगलवार को आयोजित होगी। इस बैठक के एजेंडे में भी समितियों के गठन का प्रस्ताव शामिल नहीं किया गया है, इसे लेकर भाजपा व कांग्रेस पार्षदों में भी ठनी हुई है। यही वजह है कि बैठक हंगामेदार होने के आसार हैं। यह भी एक संयोग ही है कि पहली बैठक 13 जनवरी, दूसरी बैठक 13 अप्रैल और तीसरी बैठक 13 मई को हुई। अब बैठक 13 जुलाई को होने जा रही है। इसे लेकर भाजपा पार्षद दल भी पंडितों से राय-मशविरा कर रहे हैं। भाजपा पार्षदों का कहना है कि 13 तारीख को बैठक होने के कारण ही सभी बैठकें हंगामेदार हुई यहीं नहीं साधारण सभा में चप्पल-जूते तक दिखाए गए। और एक भी प्रस्ताव पास नहीं हो पाया।

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मैं कंट्रोवर्सी में नहीं पड़ूंगा : धारीवाल

समिति गठन के मुद्दे पर धारीवाल से जब बात की गई तो वे बार-बार यही कहते रहे, महापौर से पूछिए..यह बोर्ड का काम है। बोर्ड को ही करना है। जब उन्हें बताया गया कि 90 दिन होते ही यह मामला सरकार के पाले में आ गया था, फिर भी समितियों का गठन क्यों नहीं हुआ तो भी उनका कहना था, मैं कुछ नहीं बोलूंगा। मैं कंट्रोवर्सी में नहीं पड़ूंगा।

हम फेल हो गए

समिति गठन के मामले में हम फेल हो गए हैं। अब सरकार ही समितियों का गठन कर सकती है। बोर्ड निर्वाचन के 90 दिन बाद तक ही समिति गठन का अधिकार निगम के पास था। साधारण सभा में इस बीच दो बार प्रस्ताव लाया गया। एक बार तो चर्चा ही नहीं हुई, दूसरी बार खारिज हो गया। मंगलवार को हो रही साधारण सभा की बैठक में एंजेंडे में प्रस्ताव शामिल करने के लिए महापौर ने विधिक राय मांगी थी, हमने यही राय दी है कि कानून के प्रावधानों के अनुसार 90 दिन गुजर जाने के कारण इसे एजेंडे में अब शामिल नहीं किया जा सकता। इस बारे में अब सरकार ही कुछ कर सकती है। - अशोक सिंह, डायरेक्टर लॉ, नगर निगम

हस्तक्षेप करे सरकार राज्य सरकार के शहरी व विकास विभाग को हस्तक्षेप कर समितियों का गठन करना चाहिए। चूंकि विकास व सफाई कार्य आमजन से जुड़े हुए हैं और इस संबंध में यदि कोई कानूनी प्रावधान बनाए गए हैं, तो उनका पालन करवाया जाना चाहिए। - केएस राठौड़, पूर्व न्यायाधीश राजस्थान, हाई कोर्ट

..और शहर के विधायक

क्या करना था: जयपुर शहर के 6 भाजपा व 2 कांग्रेस विधायक नगर निगम के आमंत्रित सदस्यों में हैं और निगम की राजनीतिक गतिविधियों में पूरा दखल रखते हैं। वे समिति गठन के मामले में महापौर व भाजपा पार्षदों के बीच सहमति बना सकते थे।

क्या किया : दोनों ही दलों के विधायक अपने-अपने खास पार्षदों को समिति अध्यक्ष बनाने के जुगाड़ में जुटे रहे। भाजपा ने जब समिति अध्यक्षों के नाम प्रस्तावित किए तो कांग्रेस के विधायक भी अपने पार्षदों को अध्यक्ष बनाने पर अड़ गए। नतीजतन समितियों का मामला लटका रहा।

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