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गुरुवार, 16 सितंबर 2010

आदमी ही आदमी से प्यार करता है

आदमी ही आदमी का खून रता है।
आदमी ही आदमी से प्यार रता है,
आदमी ही आदमी पर वार रता है।

गाना जो गा रहा है, वो भी आदमी है,
सडक़ पर रोता जो जा रहा है, वो भी आदमी है।
गोली जो चला रहा है वो भी आदमी है,
गोली जो खा रहा है, वो भी आदमी है।

जेलर भी है आदमी, कैदी भी है आदमी
कोड़े जो खा रहा है वो भी आदमी है,
                                                                                                                                                 रिक्शे पर जो रहा है, वो भी आदमी है।
                                                     मंदिर, मस्जिद बनवाए आदमी ने,
Sh Suresh Chandra Sharma
phone no. 9351718660
01412296683

धार्मि उन्माद आया तो उन्हें गिराया भी आदमी ने।

बुधवार, 8 सितंबर 2010

सभ्यता से असभ्यता की ओर

बाबूलाल शर्मा. जयपुर. शहरों का व्यवस्थित ढांचा कितना जरूरी है..सिंधु घाटी सभ्यता इसकी मिसाल है। तकरीबन 5000 साल पहले मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के योजनाकारों ने जान लिया था कि सही ड्रेनेज और सीवरेज सिस्टम के बिना अच्छे शहर बनाना मुमकिन नहीं। लेकिन..आज बेतरतीब फैल रहे शहरों में सरकारें बुनियादी सुविधाएं जुटाने में खरी नहीं उतर रहीं।

जयपुर के सिर्फ 25 फीसदी घर ही ड्रेनेज सिस्टम से जुड़े हैं। 300 साल पहले वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य की सोच को अगर सरकारी एजेंसियां क्रियान्वित कर शहर में इन्टीग्रेटेड ड्रेनेज सिस्टम विकसित कर लेतीं तो सड़कें बरसाती पानी में न बह जातीं।

डेढ़ करोड़ का खाका, 1100 करोड़ का प्रोजेक्ट..कागजी पुलिंदा

न या शहर बसने के बाद जब बरसात के पानी की निकासी रुकने लगी तो नगर निगम और जेडीए को आजादी के पांच दशक बाद शहर में ड्रेनेज सिस्टम विकसित करने की सुध आई। हड़बड़ी में जेडीए ने इसके लिए कन्सल्टेंसी कंपनी से डीपीआर बनवाई। ड्रेनेज सिस्टम का खाका बनाने में डेढ़ करोड़ रुपए खर्च कर दिए।

कन्सल्टेंसी कंपनी दो साल पहले 1100 करोड़ लागत का ड्रेनेज प्रोजेक्ट जेडीए को दे चुकी, लेकिन यह कागजी पुलिंदा कभी जेडीए तो कभी नगर निगम के बीच फुटबॉल बना घूम रहा है। सरकारी हुक्मरानों का कहना है कि निगम के पास सफाई जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए ही धन नहीं है।

मुंबई : कई बार भुगता है खमियाजा

खराब ड्रेनेज सिस्टम के चलते ही वर्ष 2005 में मानसून देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर बाढ़ का कहर बनकर बरसा। इससे पहले वर्ष 1985 में भी मुंबई पानी-पानी हुई थी। 2005 की बाढ़ के बाद महानगर का ड्रेनेज सिस्टम सुधारने के लिए 1200 करोड़ का बजट रखा गया, जो संभवत: 2011 में पूरा होगा। सिस्टम कहीं-कहीं सौ साल पुराना है। इसमें 440 किमी ड्रेन ढंके व कुल 2000 किमी खुले हैं। खुले ड्रेन में लोग कचरा डाल देते हैं, जो बरसात के मौसम में बंद हो जाते हैं और बाढ़ की स्थिति पैदा करते हैं।

टोक्यो का ड्रेनेज सिस्टम दुनिया में सबसे बड़ा

जापान की राजधानी टोक्यो में दुनिया का सबसे बड़ा और अत्याधुनिक ड्रेनेज सिस्टम जी-कैन्स बनाया गया है। साल 1992 में जी-कैन्स प्रोजेक्ट शुरू हुआ, इसे 2004 में पूरा किया गया। इसमें एक विशाल टबरे पंप है, जिसकी क्षमता 14000 हॉर्सपावर है। यह टबरे पंप एक सैकंड में 200 टन पानी इडोगावा नदी में डाल सकता है।

इंजीनियर कहते हैं कि पूरा समुद्र बरस जाए तो भी यह सिस्टम फेल नहीं होगा। यह जमीन में 50 मीटर गहरा है। शहरभर में फैली इससे जुड़ने वाली टनल्स सैकड़ों किलोमीटर लंबी हैं। इसे बनाने पर 90 अरब रुपए का खर्च आया है।

ड्रेनेज सिस्टम को अमल में लाने के लिए हमारे पास पैसा नहीं है। हम 1100 करोड़ का यह प्रोजेक्ट जेएनएनयूआरएम में स्वीकृत कराएं तो भी 300 करोड़ रुपए हिस्सा राशि देनी होगी, जो हमारे पास नहीं। इस स्थिति में हम कुछ नहीं कर सकते।
ज्योति खंडेलवाल,
महापौर, जयपुर

भवनों के नक्शे पास करने के बदले स्थानीय निकाय फीस लेते हैं। विकास शुल्क भी हम अलग से जमा करवाते हैं। आमजन से हाउस टैक्स-यूडी टैक्स भी सरकार लेती है। ऐसे में शहर में ड्रेनेज सिस्टम विकसित करने की जिम्मेदारी भी सरकार की ही है।
गोपाल गुप्ता, अध्यक्ष, राजस्थान बिल्डर्स एंड प्रमोटर्स एसोसिएशन